डॉलर (Dollar) इतना महंगा और रुपया (Rupee) इतना सस्ता क्यों है
हम रोज़ सुनते हैं कि 1 डॉलर (Dollar) बराबर 80 82 या 83 रुपये है ऐसा देखकर अक्सर लगता है कि डॉलर (Dollar) बहुत महंगा है और रुपया (Rupee) कमजोर है लेकिन इसकी वजहें सिर्फ एक नहीं कई आर्थिक कारण और वैश्विक परिस्थितियाँ हैं आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर यह फर्क क्यों होता है
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| Dollar Vs Rupee |
1 करेंसी की वैल्यू कैसे तय होती है
किसी भी देश की मुद्रा की कीमत बाजार में मांग और आपूर्ति से तय होती है अगर किसी मुद्रा की मांग अधिक है तो उसकी कीमत बढ़ती है और अगर कम है तो गिरती है डॉलर (Dollar) दुनिया भर में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली मुद्रा है अंतरराष्ट्रीय व्यापार कच्चा तेल आयात और वित्तीय लेनदेन में डॉलर का प्रमुख रोल है इसलिए उसकी मांग हमेशा अधिक रहती है
2 वैश्विक व्यापार और आयात निर्भरता
भारत जैसे देश जो बहुत सारा कच्चा तेल और कई चीज़ें विदेश से खरीदते हैं उन्हें भुगतान डॉलर (Dollar) में करना पड़ता है जब आयात बढ़ता है तो डॉलर (Dollar) की मांग बढ़ती है और रुपये की गिरावट आती है
उदाहरण के तौर पर जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत को ज्यादा डॉलर (Dollar) खर्च करने पड़ते हैं और रुपया कमजोर पड़ सकता है
3 विदेशी निवेश और कैपिटल फ्लो का असर
विदेशी निवेश जैसे FII और FDI किसी देश की मुद्रा को मजबूत भी कर सकते हैं या कमजोर भी यदि विदेशी निवेशक भारत से निवेश निकाल लेते हैं तो रुपये (Rupee) पर दबाव आता है और डॉलर (Dollar) के मुकाबले रुपया (Rupee) गिरता है वहीं जब विदेशी निवेश बढ़ता है तो रुपये की मांग बढ़ती है और उसकी वैल्यू सुधर सकती है
4 मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास का रोल
यदि किसी देश में महंगाई बहुत तेज़ है तो उसकी मुद्रा की ख़रीद शक्ति कम होती जाती है भारत में अगर इन्फ्लेशन बढ़े और आर्थिक वृद्धि धीमी हो तो निवेशक दूसरी मुद्राओं में जाना पसंद कर सकते हैं दूसरी तरफ अमेरिका की अर्थव्यवस्था और FED की नीतियाँ भी डॉलर (Dollar) को प्रभावित करती हैं
5 ब्याज दरें और मौद्रिक नीति
किसी देश की सेंट्रल बैंक द्वारा निर्धारित ब्याज दरें विदेशी पूँजी को आकर्षित या हटाती हैं
उदाहरण के लिए अगर अमेरिका की ब्याज दरें बढ़ती हैं तो निवेशक वहाँ पैसा लगाना चाहेंगे और डॉलर (Dollar) की मांग बढ़ेगी
भारत में RBI की नीति, ब्याज दरें और बाजार में मुद्रा की सप्लाई भी रुपये (Rupee) की वैल्यू पर असर डालती है
6 विदेशी मुद्रा भंडार और सरकार की भूमिका
देशों के पास अगर पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होता है तो वे अपनी मुद्रा को सपोर्ट कर सकते हैं भारत के पास विदेशी भंडार हैं पर अगर अचानक बड़ी निकासी या आयात शॉक आये तो रुपया (Rupee) दबाव में आ सकता है सरकार और RBI समय समय पर हस्तक्षेप कर के मार्केट को stabilize करने की कोशिश करते हैं
7 आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितताएँ
युद्ध महामारी या वैश्विक आर्थिक संकट जैसी घटनाएँ निवेशकों को जोखिम से बचाती हैं ऐसी स्थितियों में सुरक्षित माना जाने वाला डॉलर (Dollar) चुना जाता है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ दब जाती हैं
8 व्यापार घाटा यानी करंट अकाउंट डेफिसिट
यदि किसी देश का आयात निर्यात से बहुत अधिक है तो उसके विदेशी देनदारियों में बढ़ोतरी होती है भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ा तो रुपया दबाव में आ सकता है क्योंकि देश को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए डॉलर (Dollar) चाहिए होते हैं
9 मनोविज्ञान और बाजार की उम्मीदें
किसी मुद्रा की कीमत सिर्फ ठोस डेटा नहीं बल्कि उम्मीदों पर भी चलती है अगर निवेशक सोचते हैं कि रुपये की वैल्यू गिरने वाली है तो वे पहले ही डॉलर (Dollar) खरीद लेते हैं और इसी से गिरावट तेज़ हो सकती है
उदाहरण से समझना आसान है
मान लो तेल की कीमत अचानक बढ़ जाती है तो भारत को ज्यादा डॉलर (Dollar) चाहिए होंगे इसीलिए बाजार में डॉलर (Dollar) की मांग बढ़ेगी और रुपया गिर सकता है
इसी तरह वैश्विक संकट में निवेशक सुरक्षित संपत्ति के रूप में डॉलर (Dollar) लेते हैं जिससे डॉलर (Dollar) मजबूत होता है
सरकार और RBI क्या कर सकते हैं
- मौद्रिक नीति में संतुलन बनाए रखें ताकि महंगाई और विकास दोनों कंट्रोल में रहें
- विदेशी भंडार को मजबूत रखें ताकि जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप किया जा सके
- आयात में विविधता और घरेलू उत्पादन बढ़ाकर करेंट अकाउंट डेफिसिट को नियंत्रित करें
निष्कर्ष
डॉलर (Dollar) महंगा और रुपया (Rupee) सस्ता दिखना कोई एक कारण नहीं है बल्कि कई आर्थिक राजनीतिक और भावनात्मक कारणों का परिणाम है वैश्विक बाजार का प्रभाव विदेशी निवेश नीतियाँ और घरेलू आर्थिक स्थिति मिलकर मुद्रा विनिमय दर तय करती हैं समझदारी भरी वित्तीय योजना और दीर्घकालिक नीति से इन प्रभावों को संतुलित किया जा सकता है
FAQs
डॉलर (Dollar) की वैश्विक मांग अधिक है और यह अंतरराष्ट्रीय लेनदेन की प्रमुख मुद्रा है इसलिए उसकी वैल्यू मजबूत रहती है
भारत का आयात-आधारित व्यापार विदेशी निवेश का बहिर्वाह और घरेलू आर्थिक स्थितियाँ रुपये (Rupee) को कमजोर कर सकती हैं
हां यदि विदेशी निवेश बढ़े करंट अकाउंट संतुलित हो और अर्थव्यवस्था मजबूत रहे तो रुपया (Rupee) सुधर सकता है
नहीं विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं यह निवेश नहीं बल्कि ट्रेडिंग है ध्यान से और जोखिम समझकर कदम उठाना चाहिए

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