परिचय -
इस आर्टिक्ल में upsc और स्टेट pcs के लिए पॉलिटी सब्जेक्ट के मैन्स एग्जाम के कुछ इम्पोर्टेन्ट क्वेश्चन एंड उनके आंसर हिंदी भाषा में दिए जा रहे है जो निम्न लिखित है
Answer Writing Tips (उत्तर लेखन के लिए सुझाव)
- उत्तर का प्रारूप – भूमिका → मुख्य भाग → निष्कर्ष
- यदि संभव हो तो Examples का प्रयोग करें
- उत्तर सीमित शब्दों में और व्यवस्थित लिखें
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| UPSC & PCS POLITY MAINS |
वैश्वीकरण के दौर में भारतीय सविधान में वर्णित सम्पूर्ण प्रभुत्व शब्द का आदर्श अप्रासंगिक हो गया है चर्चा कीजिये?
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में अन्तराष्ट्रीय संस्थाओ का महत्व बढ़ता जा रहा है जैसे मुद्रा कोष , विश्व बैंक यह संघठन देशो की आर्थिक नीतियों को प्रभावित करते है यही कारण है की यह माना जा रहा है ली भारत के संविधान की प्रस्तावना में वर्णित सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न का आदर्श महत्वहीन या अप्रांसगिक होता जा रहा है
अप्रांसगिक नहीं तर्क- वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में भी भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न देश बना हुआ है क्योकि कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश मामलो में भारत स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता रखता है वही WTO , IMF , और WB जैसी संस्थाओ द्वारा भारत की सम्प्रभुता को प्रभावित करने का प्रश्न है तो इस सन्दर्भ में उल्लेखनिय है इन संघटको की सदस्यता भारत अपनी स्वेच्छा से स्वीकार किया है जिसे अपनी स्वेच्छा से परित्याग कर सकता है
जिससे यह स्पष्ट होता है भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न राष्ट्र है
स्पष्ट कीजिये की वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित शब्द समाजवाद अप्रांसगिकवाद हो गया है अत: इसे से हटा देना चाहिए ?
वर्ष 1991 की नई आर्थिक नीति की बदौलत देश में पूंजीवाद व निजी संपतियों को बढ़ावा मिला है जिसके कारण यह कहा जा सकता है कि भारत में पूंजीवाद मजबूत हो रहा है और समाजवाद कमजोर हो रहा है
उपरोक्त पंक्ति सही नहीं है क्योंकि भारतीय समाजवाद के केंद्र में संपत्ति का नीतिकरण या। सामाजिक ऋण मुद्दा नहीं है जबकि इसमें समानता का विचार है यद्यपि की नई आर्थिक या वैश्वीकरण के कारण भारत में पूंजीवाद मजबूत हुआ है किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में समाजवाद की समाप्ति हो गई है नई आर्थिक या वैश्वीकरण से उत्पन्न असमानता को ध्यान में रखते हुए इसका महत्व और अत्यधिक बढ़ गया है आज भी भारत में सरकार का उद्देश्य समावेशी के साथ सतत् विकास का है और वंचित वर्गों हेतु कई योजनाएं चलाई जा रही है
निष्कर्षतः हम यह कह सकते है भारत में समाजवाद की नीति का अस्तित्व है अतः आज भी पहले से अधिक प्रासंगिक है
प्रस्तावना में लोकप्रभुता शब्द का उल्लेख नहीं है तो हम यह कैसे स्वीकार करे की शक्ति का स्त्रोत जनता है ?
भारत को किस सीमा तक पंथनिरपेक्ष कहा जा सकता है स्पष्ट कीजिए ?
पंथनिरपेक्ष राज्य -
संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार राज्य और पंथ के मध्य अलगाव किया गया है इस प्रकार राज्य ना तो किसी पंथ विशेष को प्रोत्साहित करेगा और ना ही किसी पंथ निरपेक्ष के प्रति भेदभाव रखेगा यहां यह उल्लेखनीय है कि 1935 के SR भोमई वाद में उच्च न्यायालय ने पंथ निरपेक्षता को संविधान का आधारभूत ढांचा बताया था पंथ निरपेक्ष राज्य का भारतीय विचार सकारात्मक भी है क्योंकि राज्य द्वारा सभी धर्मों के प्रति एक समान व्यवहार या एक प्रकार सम्मान व्यक्त किया जाता है इसलिए भारतीय पंथ निरपेक्ष अमेरिका व फ्रांस से अलग है अमेरिका व फ्रांस के मध्य अलगाव ही पंथनिरपेक्षता है अमेरिका में पंथनिरपेक्षता अर्थात् यह अलगाव 2 तरफा है क्योंकि राज्य न तो धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करेगा ना ही धर्म राज्य के मामले में हस्तक्षेप करेगा जहां तक फ्रांस का प्रश्न है वहां पर 1 तरफा अलगाव देखने को मिलता है अर्थात् राज्य धर्म के मामले में हस्तक्षेप कर सकता है किंतु धर्म राज्य के मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है भारत में यह अलगाव अर्थात् राज्य व पंथ के मध्य अलगाव 1 तरफा दिखाई देता है किन्तु यह अलगाव के साथ सर्व धर्म सद्भाव का भी विचार रखता है भारत में इस पंथनिरपेक्ष के इस विचार को संविधान के अनुच्छेद 27 में देखा जा सकता है जहां किसी धर्म विशेष के उत्थान के लिए कर आरोपित करने पर स्पष्ट प्रतिबंध है साथ ही राज्य के द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में कोई धार्मिक नहीं दी जा सकती इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत धर्मनिरपेक्ष है
आपके अनुसार क्या भारत को संसदीय लोकतंत्र को छोड़कर अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को अपना लेना चाहिए?
भारतीय परिस्थितियों को देखते हुए अध्यक्षात्मक लोकतंत्र की अपेक्षा संसदीय लोकतंत्र प्रणाली उपयुक्त है क्योंकि भारत में जहां बड़े पैमाने पर अशिक्षा गरीबी जागरूकता का अभाव जातिवाद व संप्रदाय वाद की समस्याएं देखी जाती है साथ ही चुनाव में जनता का व्यवहार जाति धर्म विचारधारा क्षेत्र संप्रदाय etc से प्रभावित होता है अतः यह आशंका बनी। रहेगी की कोई ऐसा कट्टर व्यक्ति राष्ट्रपति बन जाएगा जिसे उसके पद से हटाना जटिल होगा इसे में यह भी संभावना बनी रहेगी कि देश में वह लोकतंत्र को नष्ट कर सकता है यह भी ध्यान रखने की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों के माध्यम से संसदीय लोकतंत्र को मूल ढांचा बताया है इस प्रकार संसदीय लोकतंत्र को हटाने में व्यावहारिक के साथ संवैधानिक अड़चने है
निष्कर्ष - हर प्रणाली में कुछ ना कुछ कमियां होती है अतः हमें प्रणाली को बदलने की जगह। उसकी कमियां को दूर करना बेहतर होगा

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